ख़्वाहिश ए ज़िंदगी
बस इतनी सी है के साथ तुम्हारा हो ओर ज़िंदगी कभी ख़त्म ना हो।
ज़िन्दगी से मेरी आदत नहीं मिलती,मुझे जीने की सूरत नहीं मिलती,कोई मेरा भी कभी हमसफ़र होता,मुझे ही क्यूँ मुहब्बत नहीं मिलती।
Chalo dushman se mulakaat kareNaya saal aaya hai nayi baat kare
Majhab k naam pe kyu danga-fasaad ?Yahi sawalaat aaj har shaks se kare
Mujhe mere Kal ki Fikar Aaj bhi nahi hai..
Par Khuwahish tO tujhe Paane ki Qayamat tak rahegi..
ज़िस्म के ज़ख्म हो तो मरहम भी लगाएं,
रूह के नासुरों का हकीम मिलता नहीं हमें!