ज़िंदगी तेरी ये हमसे नराजगी कैसी है,ख्वाबों को छीनने की तेरी ये जिद कैसी है,तिनका-तिनका जोड़ सपनों को जोड़ा है,यूँ अचानक इन्हें तोड़ने की आदत कैसी है l
शायरी सर्दी की ठिठुरती रात में फुटपाथ पर अरमान है
दिलबर मुझे छोड़के किसी और पे मेहरबान है.....
रोज़ इक ताज़ा शेऱ कहां तक लिखूं तेरे लिए,
तुझमें तो रोज़ ही एक नयी बात हुआ करती है…
अब ये हसरत है कि सीने से लगाकर तुझकोइस क़दर रोऊँ की आंसू आ जाये
कुछ अल्फ़ाज़ की तरतीब से बनती है शायरी
कुछ चेहरे भी मुकम्मल ग़ज़ल हुआ करते हैं