कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़,
ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया
सुरमई शाम का काजल लगा के रात आई है,
पलकें यूँ झुकीं हैं मानों चाँद पर बदरी छाई है!
रूह मुझे दो, जिस्म भले ही उसे देदो।
जिस्म तो खो दोगे जनाब, फिर भी रूह तो महफ़ूज़ होगी हमारे पास।
सुबह की चाय,घर की बालकनीतुम्हारे य़ादों का साथ खास है lयही सिलसिला है रोज का ,तुमसे ही चाय की मिठास है l
किसी को इतना मत चाहो कि भुला न सको,यहाँ मिजाज बदलते हैं मौसम की तरह।
नाराज़ जीने में भी लाख मज़ा है,हर लम्हें में याद और फिर नशा है lरात गुजरती नहीं हम काटते है,हर लम्हें में कई साल छांटते है l